तेरे मासूम से इश्क का , समा देखता हू .kavi balram singh rajput

तेरे मासूम से इश्क का , समा देखता हू .
तेरी एक झलक में , सारा जहाँ देखता हू.
आदि मुजरिम नही हू , तेरे इश्क का मै .
तेरी नजरो में , खुदा देखता हू.

तू आगोश में खोई , हुस्न की परी हे .
तेरे दिल में हसरते , प्यार देखता हू .
मिल ना सका मुझे , जिन्दगी में .
तुझमे ही वो अपना , यार देखता हू.

नजर बस एक ही हे , मेरी जन्नते नूर .
पर सपने तेरे , रोज हजार देखता हू .
दिखे या न दिखे , मुझे यहाँ कोई .
पर तुझी में सारा , संसार देखता हू .

तेरे माथे पे खिली , जज्बात की किरण .
तेरी आँखों में , एतबार देखता हू .
मै दरिया सा मिलना , चाहता हु तुझी में .
पर प्यार के असीम , भवर देखता हू .

तू उफनती नदी हे , या मीठा समन्दर .
जब भी देखता हू , हिलोर देखता हू .
दूर कही बंजर , रेत सी जमी में .
धरती से निकला , एक फूल देखता हू .

अब तू मुझे गुलाल सी , लगती हे .
जब भी उडती हुई , धुल देखता हू .
आदि मुजरिम नही हू , तेरे इश्क का मै .
तेरी नजरो में , खुदा देखता हू.

कवि-बलराम सिंह राजपूत
कवि हू कविताये सुनाता हू

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